वाराणसी (Kashi) में सोमवार का दिन खेल इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया, जब पहली बार भव्य स्तर पर घुड़दौड़ प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। बाबू आर.एन. सिंह स्मृति घुड़दौड़ प्रतियोगिता ने काशी की पहचान को आध्यात्मिकता से आगे बढ़ाते हुए एडवेंचर स्पोर्ट्स की नई दिशा दे दी।
परमानंदपुर स्थित मिनी स्टेडियम का मैदान (Kashi) इस खास मौके पर रेस कोर्स में तब्दील हो गया। आयोजन में 5000 से अधिक विद्यार्थी और खेल प्रेमी मौजूद रहे। तालियों की गड़गड़ाहट, उत्साह और संगीत के बीच घुड़सवारों ने अपनी प्रतिभा का शानदार प्रदर्शन किया। दर्शकों का जोश पूरे मुकाबले के दौरान चरम पर रहा।
Kashi: तीन चरणों में हुआ रोमांचक मुकाबला
प्रतियोगिता को तीन चरणों में आयोजित किया गया, जिससे हर राउंड के साथ रोमांच बढ़ता गया—
- पहला और दूसरा राउंड: 5-5 घुड़सवारों ने हिस्सा लिया और 5-5 लेप की दौड़ हुई।
- फाइनल में प्रवेश: दोनों राउंड के टॉप-2 घुड़सवारों ने फाइनल में जगह बनाई।
- फाइनल राउंड: 6 लेप की निर्णायक दौड़ में विजेता का फैसला हुआ।
इस प्रारूप ने प्रतियोगिता को और भी प्रतिस्पर्धात्मक बना दिया।
‘शक्ति’ ने मारी बाज़ी, रॉकेट और शेरू भी रहे आगे
- चार किलोमीटर की इस दौड़ में हरि नारायण का राजस्थानी नस्ल का घोड़ा ‘शक्ति’ सबसे तेज साबित हुआ। ‘शक्ति’ ने महज 2 मिनट 28 सेकंड में दौड़ पूरी कर पहला स्थान हासिल किया।
- दूसरे स्थान पर गौरव यादव का घोड़ा ‘रॉकेट’ रहा, जिसने 3 मिनट 40 सेकंड में रेस पूरी की।
- वहीं सौरभ का घोड़ा ‘शेरू’ 4 मिनट के समय के साथ तीसरे स्थान पर रहा। खास बात यह रही कि दूसरे और तीसरे स्थान पर रहे दोनों घोड़े मारवाड़ी नस्ल के थे।
प्रतियोगिता का शुभारंभ उत्तर प्रदेश एडवेंचर स्पोर्ट्स क्लब की अध्यक्ष डॉ. आशा सिंह ने हरी झंडी दिखाकर किया। आयोजन के संयोजक डॉ. ए.के. सिंह रहे। इस अवसर पर जिला ओलंपिक संघ के सचिव डॉ. शम्स तबरेज शैंपू, कोषाध्यक्ष विजय कुमार और मंडलीय क्रीड़ा सचिव राजेश सिंह दोहरी सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
काशी, जो अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत के लिए प्रसिद्ध है, अब खेल और एडवेंचर गतिविधियों में भी नई पहचान बना रहा है। प्राचीन भारत में घोड़े शक्ति, वीरता और युद्ध कौशल के प्रतीक माने जाते थे। घुड़दौड़ की परंपरा राजपूत और मराठा काल से जुड़ी रही है।

