BHU के 28 साल पुराने ‘नियमितीकरण’ विवाद पर हाईकोर्ट सख्त, केंद्र और UGC से मांगा जवाब

काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) में वर्षों से कार्यरत कर्मचारियों के नियमितीकरण का मामला अब इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंच गया है। हाईकोर्ट ने मामले को गंभीरता से लेते हुए केंद्र सरकार, यूजीसी और बीएचयू प्रशासन से जवाब तलब किया है। अदालत के इस कदम से विश्वविद्यालय में लंबे समय से संविदा और दैनिक वेतन पर कार्य कर रहे हजारों कर्मचारियों में उम्मीद जगी है।

दरअसल, बीते कुछ दिनों से बीएचयू (BHU) में नियमितीकरण को लेकर कर्मचारियों का आंदोलन तेज हो गया था। विभिन्न विभागों के कर्मचारियों ने मधुबन पार्क में बड़ी संख्या में शांतिपूर्ण प्रदर्शन करते हुए स्थायी नियुक्ति की मांग उठाई थी। कर्मचारियों का कहना था कि वे वर्षों से विश्वविद्यालय की सेवा कर रहे हैं, लेकिन उन्हें अब तक स्थायी कर्मचारी का दर्जा नहीं दिया गया। बाद में विश्वविद्यालय प्रशासन और जिला प्रशासन के आश्वासन पर आंदोलन को कुछ दिनों के लिए स्थगित कर दिया गया था।

‘आर्टिफिशियल ब्रेक’ देकर कराया जा रहा काम

इसी बीच टेलीफोन लाइनमैन के रूप में कार्यरत राम सिंह उर्फ शमशेर सिंह और अन्य कर्मचारियों द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की एकलपीठ ने महत्वपूर्ण आदेश जारी किया। याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत को बताया गया कि वे वर्ष 1998 से लगातार बीएचयू में कार्यरत हैं और उनका सेवा रिकॉर्ड पूरी तरह साफ-सुथरा है।

याची पक्ष के अधिवक्ता ने अदालत में यह भी बताया कि वर्ष 2004 में बीएचयू की टेलीकम्युनिकेशन सर्विसेज कमेटी ने इन कर्मचारियों के नियमितीकरण का प्रस्ताव पारित किया था। उस समय के कुलपति ने इस प्रस्ताव को मंजूरी भी दे दी थी और वर्ष 2005 में इसकी अधिसूचना भी जारी कर दी गई थी। बावजूद इसके आज तक इस निर्णय को लागू नहीं किया गया।

कर्मचारियों का आरोप है कि उनसे स्थायी प्रकृति का कार्य लगातार लिया जा रहा है, लेकिन उन्हें संविदा और दैनिक वेतनभोगी बनाकर रखा गया है। याची पक्ष ने अदालत में इसे श्रम शोषण करार देते हुए कहा कि जब पद स्वीकृत हैं और कार्य नियमित प्रकृति का है, तो कर्मचारियों को वर्षों तक अस्थायी रखना संविधान के सिद्धांतों के विपरीत है।

BHU: कर्मचारियों को फैसले से उम्मीद

याचिका में यह भी कहा गया कि बीएचयू के रजिस्ट्रार द्वारा 18 सितंबर 2025 को नियमितीकरण की मांग खारिज कर दी गई थी, जबकि सुप्रीम कोर्ट के कई हालिया फैसलों में लंबे समय से कार्यरत कर्मचारियों के हितों की सुरक्षा पर जोर दिया गया है। हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) और बीएचयू प्रशासन से जवाब मांगा है। अब इस मामले की अगली सुनवाई में विश्वविद्यालय प्रशासन (BHU) को अपना पक्ष रखना होगा।

इस आदेश के बाद बीएचयू (BHU) के अन्य विभागों में वर्षों से कार्यरत संविदाकर्मियों और दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों में भी उम्मीद बढ़ गई है। कर्मचारियों का मानना है कि यदि अदालत से राहत मिलती है तो विश्वविद्यालय में लंबे समय से लंबित नियमितीकरण का रास्ता खुल सकता है।

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