Varanasi में मंगलवार को एक ऐसा नज़ारा देखने को मिला, जिसने हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। आम विरोध प्रदर्शनों से अलग, इस बार आवाज़ उठाने का तरीका भी अनोखा था और संदेश भी बेहद गहरा।
जिला मुख्यालय पर अचानक बड़ी संख्या में लोग आदिवासी वेशभूषा में पहुंचते हैं—किसी ने पत्तों से बना परिधान पहना है, तो कोई पारंपरिक रूप में नजर आता है। ये कोई सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक सशक्त विरोध प्रदर्शन था। ये लोग थे भारतीय जनता पार्टी के अनुसूचित जनजाति (ST) मोर्चा के कार्यकर्ता, जो अपने अधिकारों की लड़ाई को एक अलग अंदाज़ में सामने लाने आए थे।
Varanasi: प्रशासन के खिलाफ जताई नाराज़गी
प्रदर्शनकारियों ने साफ कहा कि यह सिर्फ कागज का टुकड़ा नहीं, बल्कि उनकी पहचान, उनके हक और उनके भविष्य का सवाल है। प्रदर्शन का नेतृत्व जिला महामंत्री अरुण कुमार गोंड कर रहे थे। उनके साथ बड़ी संख्या में कार्यकर्ता और स्थानीय लोग भी शामिल हुए। सभी ने एक सुर में प्रशासन के खिलाफ नाराज़गी जताई और तत्काल हस्तक्षेप की मांग की।
प्रदर्शन के दौरान अरुण कुमार गोंड का बयान सबसे ज्यादा चर्चा में रहा। उन्होंने कहा, “जब भी हम आवेदन लेकर जाते हैं, तो हमसे पूछा जाता है कि आदिवासी तो जंगलों में रहते हैं, वाराणसी में कैसे हो सकते हैं? लेकिन ये सोच पूरी तरह गलत है। आदिवासी केवल जंगलों तक सीमित नहीं हैं।”
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि जाति प्रमाण पत्र रद्द होने से छात्रों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है, युवाओं को नौकरी में दिक्कतें आ रही हैं और कई लोग सरकारी योजनाओं (Varanasi) के लाभ से वंचित हो रहे हैं।
उनका साफ कहना है कि यह सिर्फ दस्तावेज का मुद्दा नहीं, बल्कि उनके अधिकारों और आने वाले भविष्य की लड़ाई है। प्रदर्शनकारियों (Varanasi) ने प्रशासन से मांग की कि जिन जाति प्रमाण पत्रों को निरस्त किया गया है, उनकी निष्पक्ष जांच कर उन्हें जल्द बहाल किया जाए। साथ ही भविष्य में बिना ठोस आधार के ऐसे कदम न उठाए जाएं।

