Mangala Kapoor: कभी तेजाब हमले ने उनका चेहरा झुलसा दिया था, समाज ने ताने दिए, स्कूल ने ठुकराया और जिंदगी ने बार-बार कठिन इम्तिहान लिए। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने दर्द को सुरों में ढाल दिया और आज वही सुर उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक पद्मश्री तक ले आए।
भारतीय शास्त्रीय संगीत की वरिष्ठ गायिका और “काशी की लता” के नाम से प्रसिद्ध Mangala Kapoor को पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया गया है। यह सम्मान केवल उनकी संगीत साधना का नहीं, बल्कि उस अदम्य साहस, आत्मविश्वास और संघर्ष का भी सम्मान है जिसने उन्हें लाखों लोगों के लिए प्रेरणा बना दिया।
सम्मान मिलने के बाद भावुक Mangala Kapoor ने कहा, “मैं अपनी खुशी को शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकती। मेरे जैसी महिला के लिए पद्मश्री तक पहुंचना कितना कठिन रहा होगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। यह सम्मान केवल मेरा नहीं, बल्कि उन सभी लोगों का है जिन्होंने हर मुश्किल समय में मेरा साथ दिया।”
12 साल की उम्र में बदल गई पूरी जिंदगी
Mangala Kapoor की जिंदगी का सबसे भयावह अध्याय तब शुरू हुआ जब वह मात्र 12 वर्ष की थीं। पारिवारिक व्यावसायिक रंजिश के चलते उन पर तेजाब से हमला कराया गया। जांच में सामने आया कि इस साजिश को घर के एक नौकर के माध्यम से अंजाम दिया गया था।
इस हमले में उनका चेहरा और शरीर बुरी तरह झुलस गया। अगले छह वर्षों तक अस्पताल, ऑपरेशन थिएटर और इलाज ही उनकी दुनिया बन गए। लेकिन शारीरिक पीड़ा से भी अधिक उन्हें मानसिक और सामाजिक पीड़ा ने तोड़ा। आज भी उस घटना को याद करते हुए उनकी आंखें नम हो जाती हैं। “जब भी उस दिन को याद करती हूं, आंखों में आंसू आ जाते हैं और पूरा शरीर सिहर उठता है।”
जख्म केवल शरीर पर नहीं, आत्मा पर भी लगे
एसिड अटैक के बाद समाज का व्यवहार उनके लिए दूसरी बड़ी परीक्षा बन गया। कई लोगों ने सहानुभूति देने के बजाय उन्हें ही दोषी मानने जैसा व्यवहार किया। लगातार सर्जरी के बाद जब उनका चेहरा कुछ सामान्य हुआ तो पिता ने उन्हें दोबारा स्कूल भेजा, लेकिन वहां भी उन्हें संवेदनशीलता नहीं मिली। आठवीं कक्षा में सहपाठियों ने उनका मजाक उड़ाया। यह घटना उनके लिए असहनीय साबित हुई।
“मैं पसीने से भीगकर वहीं गिर पड़ी। उसके बाद फिर कभी स्कूल जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाई।” बाद में उन्होंने घर से ही पढ़ाई जारी रखी और बारहवीं तक की शिक्षा पूरी की। इस पूरे संघर्ष में उनके पिता उनका सबसे बड़ा संबल बने। उन्होंने बेटी को हमेशा यह विश्वास दिलाया कि इस हादसे में उसकी कोई गलती नहीं थी।
37 सर्जरी… फिर भी नहीं टूटा हौसला
आज तक Mangala Kapoor 37 बड़ी सर्जरी करवा चुकी हैं। दर्द, इलाज और सामाजिक उपेक्षा के लंबे दौर के बावजूद उन्होंने जीवन से समझौता नहीं किया। उन्होंने संगीत को अपना सहारा बनाया। उनके लिए संगीत केवल कला नहीं रहा, बल्कि जीवन को दोबारा जीने की वजह बन गया। “संगीत ने मुझे जीने की नई ऊर्जा दी। आत्मविश्वास लौटाया। मेरे लिए संगीत ही संजीवनी है।”
मंदिर के भजन से शुरू हुआ सुनहरे सफर का पहला सुर
कॉलेज के दिनों में एक मंदिर में भजन गाते समय पहली बार लोगों ने उनकी आवाज की असाधारण मिठास को महसूस किया। उनकी गायकी ने श्रोताओं को इतना प्रभावित किया कि धीरे-धीरे उन्हें सांस्कृतिक कार्यक्रमों और प्रतिष्ठित मंचों पर आमंत्रित किया जाने लगा। समय के साथ उनकी पहचान उनके चेहरे से नहीं, बल्कि उनकी आवाज से बनने लगी। यही आवाज उन्हें देशभर के प्रतिष्ठित संगीत समारोहों तक ले गई और वह भारतीय शास्त्रीय संगीत की सम्मानित हस्ती बन गईं।
तीन दशक तक बीएचयू में तैयार की संगीत की नई पीढ़ी
ग्वालियर घराने की सुप्रसिद्ध गायिका Mangala Kapoor ने वर्ष 1989 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य शुरू किया। लगभग 30 वर्षों तक उन्होंने हजारों विद्यार्थियों को भारतीय शास्त्रीय संगीत की शिक्षा दी। शिक्षण के साथ-साथ उन्होंने देशभर के प्रतिष्ठित मंचों पर अपनी प्रस्तुतियों से भारतीय संगीत की समृद्ध परंपरा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।
संगीत के अलावा वह दिव्यांगजनों के कल्याण के लिए भी लगातार कार्य करती रही हैं और लेखन के माध्यम से समाज में संवेदनशीलता और जागरूकता फैलाने का प्रयास कर रही हैं।

